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दिनेश अब 3 - 4 साल का हो चूका है अब उसे भी दूसरे बच्चों की तरह ही आंगनवाड़ी स्कूल जाना था , जैसे ही उसे स्कूल छोड़ा गया मानो चूजा अंडा तोड़ के संसार देखना शुरू कर चूका हो , दिनेश उस समय से ही शारीरिक तौर से कमजोर था पर समय बदलने लगा था , अब उसका समय  घर की मौज मस्ती तथा स्कूल की धमाचौकड़ी के साथ समय बीत रहा था। उसके पिता जी भी अब नियमित हो चुके थे और उसके भाई बहन भी प्राथमिक स्कूल जाने लगे थे भाई - बहन पढ़ाई में हमेशा अवल रहते थे, इस पढ़ाई वाले मौहाल में दिनेश का भी दिल पढ़ाई करने का हो रहा था और स्कूल मे जाने के बारे में  सोचना भी शुरू कर चूका था फिर एक दिन उसने घर में कह  दिया की अब उसे प्राथमिक स्कूल भेजा जाए। 
उसके माता पिता यह सुनकर बहुत खुश हुए और इस बात का इंतज़ार हो रहा था कि  दिनेश कब 5 साल का हो जाये और  स्कूल भेजा जाए। दिनेश बचपन से ही होशियार था जो अब एक अच्छी जिंदगी के  सपने देखना  शुरू कर चूका था , कहता था की स्कूल जा कर इसी स्कूल में अध्यापक  लगेगा।  
दिनेश स्कूल में हमेशा ही अवल आता था , ये सिलसिला बस पांचवीं कक्षा तक ही चलने वाला था। स्कूल से ही दिनेश मुश्किल वक्त से लड़ने को तैयार हो रहा था उसके स्कूल में  उस समय चटाई पर बैठते थे और लकड़ी की तख्ती पर खास तरह की लकड़ी से बनाई हुई कलम से लिखा जाता था जिसमें लिखने के लिए काली स्याही का उपयोग किया जाता था , उस समय स्कूल की बर्दी भी पारपम्परिक भारतीय पहनावा था नीले रंग का कुर्ता और पायजामा , खेल कूद के लिए भी अच्छा मैदान स्कूल के आगे ही था पर उस समय खेल कूद के लिए सामान भी उपलब्ध नहीं  था तो उस समय के गांव के कुछ मशहूर खेलों में गिल्ली - डंडा, क्रिकेट , छुपन - छुपाई , चोर पुलिस , चौकड़ी और कंचे इत्यादि था।
उन दिनों स्कूल में  दो अध्यापक थे जो कि पहली से पाँचवी तक की कक्षाओं को सभी विषय पढ़ाते थे , इनमें से दिनेश एक आज्ञाकारी बालक था और अध्यापकों का भी बहुत प्यारा था , स्कूल में दिनेश की पहचान एक बुद्धिमान बालक के रूप में थी अभी तक दिनेश पांचवी कक्षा तक पहुँच गया है और अध्यापकों के आशीर्वाद से उसका समय करवट लेने वाला था इससे आगे की कहानी अगले ब्लॉग में :-  

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